मांगलिक दोष तब बनता है जब किसी जातक की जन्म कुंडली के 1st (लग्न), 4th, 7th, 8th या 12th भाव में मंगल ग्रह स्थित होता है। मंगल की उग्र ऊर्जा के कारण वैवाहिक सामंजस्य, दांपत्य सुख और संबंधों में तालमेल प्रभावित हो सकता है।
मांगलिक जातकों में अत्यधिक ऊर्जा, दृढ़ संकल्प और स्वाभिमान होता है, किंतु उतावलेपन के कारण विवाह में विलंब या जीवनसाथी के साथ वैचारिक मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं। सही समझ और मार्गदर्शन से यह दोष पूर्णतः नियंत्रित रहता है।
यदि मंगल अपनी स्वराशि (मेष, वृश्चिक) या उच्च राशि (मकर) में स्थित हो, या गुरु और शुक्र की शुभ दृष्टि उस पर पड़ रही हो, अथवा दोनों वर-वधू मांगलिक हों, तो यह दोष पूर्णतः निष्प्रभावी हो जाता है।
प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ, मंगलवार को सुंदरकांड, कुंभ विवाह अथवा अर्क विवाह अनुष्ठान, और मंगल शांति पूजा से इस दोष का समूल निवारण हो जाता है।
हाँ, यदि गैर-मांगलिक जातक की कुंडली में उसी भाव में शनि, राहु या केतु स्थित हों, तो मांगलिक दोष का सामंजस्य हो जाता है और विवाह सुखद रहता है।
ज्योतिषीय मतानुसार 28 वर्ष की आयु के पश्चात मंगल की आक्रामकता स्वाभाविक रूप से शांत होने लगती है, जिससे दोष का प्रभाव अत्यंत क्षीण हो जाता है।
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