वास्तु शास्त्र प्रकृति के पांच मूलभूत तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) तथा चुंबकीय ऊर्जा के संतुलन का प्राचीन वैदिक विज्ञान है। भवन में इन ऊर्जाओं के सही समन्वय से परिवार में स्वास्थ्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) भगवान शिव और जल तत्व का स्थान है, आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) अग्नि देव का, नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम) पृथ्वी तत्व और स्थिरता का, तथा वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इन दिशाओं के अनुरूप कमरों का निर्माण सुख-समृद्धि लाता है।
मुख्य द्वार का निर्माण उत्तर, पूर्व या ईशान कोण में होना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। पूजा घर सदैव ईशान कोण में स्थापित करना चाहिए, जिससे जातक का मुख पूजा करते समय पूर्व या उत्तर की ओर रहे।
स्वास्तिक, ॐ, तांबे के पिरामिड, समुद्री नमक, और दिशा-संतुलक रंगों के प्रयोग से घर के वास्तु दोषों का सरलता से निवारण किया जा सकता है।
हाँ, जिस स्थान पर आप निवास करते हैं, उसकी ऊर्जा आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।
कुबेर देव की दिशा उत्तर होने के कारण तिजोरी का मुख सदैव उत्तर दिशा की ओर खुलना चाहिए।
Astrology guidance is not a substitute for medical, legal or financial advice.
संबंधित लेख पढ़ें: Vastu for Home (English) | कुंडली इन हिंदी | संपर्क करें